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काशी में आज नाटी इमली में सजेगा भरत मिलापः 5 मिनट की लीला देखने पहुंचेंगे लाखों आस्थावान, काशी नरेश भी होंगे शामिल

चीफ एडिटर – अमर नाथ साहू
यूपी हेड – अजय लखमानी

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काशी की 488 साल पुरानी विश्वप्रसिद्ध नाटी इमली की भरत मिलाप लीला के लिए आज श्रद्धालुओं की भीड़ जुटेगी। विजयादशमी के दो दिन बाद 22 अक्तूबर को होने वाली इस ऐतिहासिक लीला में भगवान श्रीराम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न के मिलन का साक्षी बनने के लिए बड़ी संख्या में लोग पहुंचेंगे।

तिथियों के फेर के कारण इस बार भरत मिलाप का आयोजन परंपरागत तारीख से अलग हो रहा है। आयोजकों के अनुसार, पहली बार विजयादशमी के अगले दिन के बजाय एकादशी तिथि पर लीला का आयोजन होगा।

श्रीचित्रकूट रामलीला समिति के व्यवस्थापक मुकुंद उपाध्याय ने बताया कि आश्विन शुक्ल पक्ष की पापांकुशा एकादशी को नाटी इमली की भरत मिलाप लीला आयोजित की जाती है। काशी के पंचांगों के अनुसार, इस बार एकादशी 22 अक्तूबर को पड़ रही है। इसी कारण लीला की तारीख में बदलाव किया गया है।

यदुवंशियों के कंधों पर आता है रघुकुल का रथ नाटी इमली की भरत मिलाप लीला की सबसे खास परंपरा यदुवंशियों की भागीदारी है। धोती-बनियान पहने, सिर पर पगड़ी और आंखों में सुरमा लगाए यादव बंधु भगवान श्रीराम के पुष्पक विमान को अपने कंधों पर उठाकर लीला स्थल तक लाते हैं।

करीब पांच टन वजनी पुष्पक विमान को फूल की तरह उठाकर लाने का यह दृश्य श्रद्धालुओं के लिए आकर्षण का केंद्र रहता है। इसी परंपरा के कारण काशी में कहा जाता है कि यहां यदुकुल के कंधों पर रघुकुल का रथ सवार होता है।

शाम 4:40 बजे थम सा जाता है माहौल

भरत मिलाप का सबसे भावुक क्षण शाम करीब 4:40 बजे देखने को मिलता है। अस्ताचलगामी सूर्य की किरणें जब मैदान के निर्धारित स्थान पर पड़ती हैं, तब कुछ मिनटों के लिए पूरा माहौल भावनाओं में डूब जाता है।

भगवान श्रीराम और लक्ष्मण के वनवास से लौटने पर भरत और शत्रुघ्न अपने भाइयों के स्वागत में जमीन पर लेट जाते हैं। दूसरी ओर, राम और लक्ष्मण उनकी ओर दौड़ पड़ते हैं। चारों भाइयों का मिलन होते ही पूरा मैदान जय श्रीराम के उद्घोष से गूंज उठता है।

काशी राज परिवार भी होता है शामिल

इस ऐतिहासिक लीला में काशी राज परिवार की भागीदारी भी परंपरा का हिस्सा है। पूर्व काशी नरेश महाराज उदित नारायण सिंह ने वर्ष 1796 में पहली बार इसमें शाही अंदाज में भाग लिया था। इसके बाद राज परिवार की पीढ़ियां इस परंपरा का निर्वहन करती आ रही हैं। भरत मिलाप केवल धार्मिक आयीजन नहीं, बल्कि काशी की सांस्कृतिक विरासत और सामाजिक एकता का प्रतीक भी है।

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