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समाज -राष्ट्र की सेवा सच्चे अर्थों में संत -सैनिक ही करते हैं, इस बार रसड़ा विधानसभा की बागडोर महंत कौशलेन्द्र गिरि के हाथ?

लेखक : रवि प्रताप आर्य

राष्ट्र निर्माण में जितना योगदान सैनिक का है उतना ही योगदान संत का है। मुगलिया सल्तनत से लेकर अंग्रेजी हुकूमत को भारत की भूमि से उखाड़ फेंकने में सिपाही व संत ने अपना सर्वस्व समर्पित किया है।
अंग्रेजों से आज़ादी का संघर्ष उनके भारत आगमन के साथ ही शुरू हो गया था और अंग्रेजों को इस धरती से खदेड़ने के लिए अनेक आंदोलन हुए। भारत के हर कोने में समाज के हर वर्ग ने अपनी मातृभूमि को आज़ाद कराने के लिए इन विदेशी आक्रांताओं के विरुद्ध संघर्ष किया। इसमें भारत के संन्यासी भी अलग नहीं थे। संन्यासी तब से ही इस देश और इसकी समृद्ध विरासत व संस्कृति के लिए लड़ने के लिए तत्पर रहे हैं। चाहे वह 1664 में काशी विश्वनाथ मंदिर की रक्षा के लिए औरंगज़ेब की शक्तिशाली मुग़ल सेना को हराने वाले नागा साधुओं का संघर्ष हो या 1757 में अफ़गानों की लूट से पवित्र नगरी गोकुल की रक्षा, भारत के संन्यासी हमेशा धर्म की रक्षा के लिए अग्रिम पंक्ति में रहे हैं।

बात करें,सन्यासी जीवन संत -महंत की तो ये लोग भी राष्ट्र -धर्म रक्षा के लिए जब-जब,जहाँ- जहाँ जरूरत पड़ी है तब -तब, वहां -वहां खड़े मिले हैं। अगर आधुनिक काल की बात करें तो संत -महंत परंपरा राजनीतिक क्षेत्र में प्रवेश कर सीधे तौर पर समाज, देश व धर्म की रक्षा कर रही है।कहा जा सकता है कि संत समाज राजनीतिक क्षेत्र में पूर्ण रूप से उतरता है तो समाज के विकास के साथ -साथ भ्रष्टाचार पर भी अंकुश लग सकता है।

राजनैतिक दृष्टि से यदि हम रसड़ा विधानसभा की बात करें तो इन दिनों रसड़ा विधानसभा भी अपने बहुमुखी विकास के लिए एक महंत की ही मांग कर रहा है। आगामी वर्ष 2027 में उत्तर प्रदेश, विधानसभा चुनाव होने हैं। ऐसे में प्रत्याशीगण अभी से ही क्षेत्र भ्रमण पर निकल चुके हैं। प्रत्याशी अपने भाग्य को आजमाने के लिए तैयारियों में जुटे हुए हैं। बात करें, रसड़ा विधानसभा की तो यहाँ इन दिनों श्रीनाथ मठ के पीठाधीश्वर व महामंडलेश्वर स्वामी कौशलेंद्र गिरी जी काफी चर्चा में हैं।

महंत कौशलेंद्र गिरी का समाज के प्रति निस्वार्थ भाव से चलना उनके संत परंपरा को प्रदर्शित करता है तो वहीं महंत जी के इस कार्य को जनता बखूबी सराह रही है। लोगों में चर्चा है कि विकास कार्य के संबंध में जो कार्य संत -महंत कर सकते हैं वो कार्य कोई अन्य व्यक्ति नहीं कर सकता क्योंकि संत महंत का कार्य भ्रष्टाचार से कोसों दूर वास्तविक मानक पर टीका होता है। संत समाज के कार्य में लोभ का लोप नहीं होता।

यदि भारतीय राजनीति के संदर्भ में बात की जाए तो पता चलता है कि प्राचीन काल से ही राजनीति साधू संन्यासियों के शुद्ध अंतःकरण से निकले चिंतन से प्रेरित होकर चलती रही है। लोक कल्याण की जितनी समझ साधु संन्यासियों को हो सकती है, उतनी किसी भी राजसिक प्रवृत्ति के व्यक्ति से अपेक्षा नहीं की जा सकती ? पूर्णतया सात्विक भाव में ही चिंतन पवित्रता को प्राप्त होता है । स्पष्ट है कि सात्विक भाव किसी सच्चे साधु का ही हो सकता है। उसके चिंतन में किसी के प्रति पक्षपात नहीं होता। हम सभी जानते हैं कि लोक कल्याण करना ही राजनीति का सर्वोत्तम धर्म है।


रसड़ा निवासी एक मतदाता ने अपनी राय रखते हुए कहा कि राष्ट्र सर्वोपरि की महत्ता को जितना बेहतर संत – सैनिक समझ सकते हैं उतना कोई नहीं। आने वाले समय में रसड़ा विधानसभा की बागडोर एक संत ही संभालने वाले हैं। आधुनिक सुविधाओं से कोसों दूर रसड़ा अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहा है, जिसे अब एक महंत को सौंपना अति आवश्यक हो गया है।


सदियों से समाज – राष्ट्र,संतों, संन्यासियों, साधु महात्माओं की पवित्र बुद्धि से संचालित होता रहा। महाभारत काल में भी हमें ऐसा ही समन्वय बना हुआ दिखाई देता है। जब संत और सिपाही, माला और भाला मिलकर राष्ट्र निर्माण के कार्य में लगे हुए दिखाई देते हैं। इसको हमारे ऋषि महात्मा और राजनीतिक मनीषी लोग शस्त्र और शास्त्र का राष्ट्रहित में किया गया समन्वय कहकर संबोधित करते थे।


जब-जब राजनीति पथभ्रष्ट हुई है तब तब हमारे साधु संन्यासियों ने उसके लिए पथ प्रदर्शक का कार्य किया। यदि आवश्यकता हुई तो शासन को सीधे अपने हाथों में लेकर लोगों का नेतृत्व करने में भी किसी प्रकार का संकोच नहीं किया। सन्यासी जीवन व्यतीत कर रहे रसड़ा श्रीनाथ मठ के महंत व महामंडलेश्वर स्वामी कौशलेंद्र गिरी जी महाराज को रसड़ा की जनता अब अपने विधायक के रूप में भी देखना चाहती है। राजनैतिक क्षेत्र में महंत कौशलेंद्र गिरी को जनता काफी पसंद कर रही है।

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