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वाराणसी में 14 साल साथ निभाने वाले ‘कल्लू’ की तेरहवीं: 700 लोगों को कराया भोज, भटके हुए पिल्ले को परिवार ने अपनाया था

चीफ़ एडिटर – अमर नाथ साहू
डिस्ट्रिक रिपोर्टर – धनेश बदलानी

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वाराणसी के फुलपुर थाना क्षेत्र के नथईपुर गांव में सोमवार को एक अनोखा आयोजन देखने को मिला। गांव निवासी दीपक कुमार दुबे के परिवार ने अपने 14 साल तक साथ निभाने वाले पालतू कुत्ते ‘कल्लू’ की मौत के बाद हिंदू रीति-रिवाज से तेरहवीं संस्कार कराया। कार्यक्रम में करीब 700 लोगों के लिए भोज का आयोजन किया गया।
परिवार का कहना है कि कल्लू के घर आने के बाद उनकी आर्थिक स्थिति मजबूत हुई, जिसे वे बाबा भैरवनाथ की कृपा मानते हैं। यही वजह है कि उन्होंने उसे परिवार के सदस्य की तरह अंतिम विदाई दी।
जानिए मामला

नथईपुर गांव निवासी वेद प्रकाश दुबे ने बताया कि करीब 14 वर्ष पहले उनके पिता दिलीप दुबे ने एक भटके हुए पिल्ले को अपने घर में आश्रय दिया था। भोजन मिलने के बाद वह यहीं रहने लगा और परिवार ने उसका नाम ‘कल्लू’ रख दिया। धीरे-धीरे वह परिवार का सदस्य बन गया। दिनभर वह घर के अंदर रहता, जबकि रात करीब नौ बजे से सुबह तक पूरे घर और आसपास के मोहल्ले की रखवाली करता था। किसी अनजान व्यक्ति के घर के पास आते ही वह लगातार भौंककर परिवार को सतर्क कर देता था।

परिवार का कहना है कि कल्लू के आने के बाद उनके घर की आर्थिक स्थिति में लगातार सुधार हुआ। उनका विश्वास है कि यह बाबा भैरवनाथ की कृपा थी। इसी आस्था और भावनात्मक लगाव के चलते 22 जुलाई 2026 को उम्र अधिक होने और सामान्य बीमारी से उसकी मौत होने पर उसका हिंदू रीति-रिवाज से अंतिम संस्कार किया गया। सोमवार को उसकी तेरहवीं भी पूरे विधि-विधान से संपन्न कराई गई। परिवार स्वयं ब्राह्मण है, इसलिए तेरहवीं में ब्राह्मणों को आमंत्रित कर धार्मिक अनुष्ठान कराया गया और करीब 700 लोगों को भोजनअनुष्ठान कराया गया और करीब 700 लोगों को भोजन कराया गया।

गांव में पहली बार हुई कुत्ते की तेरहवीं

ग्राम प्रधान शोभनाथ यादव ने बताया कि गांव में पहली बार किसी पालतू कुत्ते की तेरहवीं का आयोजन हुआ है। उन्होंने कहा कि कल्लू पूरे मोहल्ले की सुरक्षा करता था। वह परिचित लोगों को देखकर दुम हिलाता था, लेकिन अनजान व्यक्ति या संदिग्ध गतिविधि देखकर तुरंत भौंकने लगता था। उसकी वजह से रात में लोग खुद को सुरक्षित महसूस करते थे और चोरी जैसी घटनाओं का भी डर नहीं रहता था।

भावुक हुए परिवार के सदस्य

परिवार के सदस्यों ने बताया कि कल्लू की मौत से उन्हें ऐसा लगा जैसे उनका कोई अपना सदस्य हमेशा के लिए बिछड़ गया हो। तेरहवीं कार्यक्रम में उसकी तस्वीर रखकर श्रद्धांजलि दी गई। गांव के लोगों ने भी पुष्प अर्पित कर उसे अंतिम श्रद्धांजलि दी। वीरेंद्र मिश्रा, गुलाब चौहान, ब्रह्मदेव दुबे, दिनेश सिंह, आनंद दुबे, सुरेंद्र दुबे, रामराज पटेल, दया पटेल सहित बड़ी संख्या में ग्रामीण कार्यक्रम में शामिल हुए।
पशु चिकित्सक बोले- परिवार से गहरा जुड़ाव होना स्वाभाविक

पिंडरा ब्लॉक के मंगारी मुख्यालय पर तैनात पशु चिकित्सक डॉ. बंशीधर सिंह ने बताया कि सामान्यतः कुत्तों की आयु 15 से 16 वर्ष होती है। उन्होंने कहा कि कुत्ते बेहद वफादार होते हैं और लंबे समय तक परिवार के साथ रहने पर सदस्य की तरह घुल-मिल जाते हैं। ऐसे में उनकी मृत्यु के बाद परिवार का भावनात्मक रूप से जुड़ाव होना और इस तरह श्रद्धांजलि देना स्वाभाविक है।

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