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दीपावली पर घर-घर विराजेंगे लक्ष्मी-गणेश, मूर्तियों को आकार देने में जुटे कुम्हार, मिट्टी की मंहगाई की मार से जूझ रहे कलाकार

चीफ एडिटर : अमर नाथ साहू
डिस्ट्रिक्ट रिपोर्टर : धनेश बदलानी

वाराणसी: दीपावली और धनतेरस की तैयारियों के बीच वाराणसी के कुम्हार बस्तियों में इन दिनों दिन-रात रौनक बनी हुई है। फुलवरिया स्थित कुम्हार परिवार भगवान गणेश और माता लक्ष्मी की मूर्तियों को अंतिम रूप देने में जुटे हैं। मिट्टी की खुशबू और रंगों की छटा से सजी गलियों में कारीगरों की मेहनत और कला दोनों ही झलकती है।

फुलवरिया निवासी शारदा देवी बताती हैं कि उनका परिवार कई वर्षों से मूर्ति निर्माण का कार्य करता आ रहा है। “हम लोग छह महीने पहले से ही दीपावली की तैयारी में लग जाते हैं। पहले मिट्टी की मूर्तियाँ गढ़ी जाती हैं, फिर सूखने के बाद एक महीने तक रंग-रोगन का काम चलता है। परिवार के सभी सदस्य इस काम में हाथ बंटाते हैं,” वे कहती हैं।

हालांकि, इस कला को जीवित रखना अब आसान नहीं रह गया है। शारदा देवी बताती हैं कि “मिट्टी अब बनारस में नहीं मिलती, हमें बाहर से लानी पड़ती है। एक ट्रैक्टर मिट्टी लाने में लगभग ₹4000 खर्च हो जाता है। ऊपर से रंग, कपड़ा, सजावट का खर्च अलग है। मेहनत बहुत है, लेकिन आमदनी उतनी नहीं होती।

उनका कहना है कि बढ़ती महंगाई और सरकारी सहयोग की कमी ने पारंपरिक कारीगरों की स्थिति कठिन बना दी है। “हम चाहते हैं कि सरकार हमारी तरफ ध्यान दे ताकि हम लोग इस परंपरा को आगे बढ़ा सकें। हम तो चाहते हैं कि हमारी बेटियाँ और बहुएँ भी इस कला को सीखें, लेकिन आज के हालात देखकर वे हतोत्साहित हो जाती हैं,” शारदा देवी कहती हैं।

इसी क्षेत्र की ज्योति देवी भी पिछले आठ वर्षों से मूर्ति निर्माण का कार्य कर रही हैं। वे बताती हैं कि “जब से ससुराल आई हूँ, यही काम कर रही हूँ। पर अब लागत बढ़ने के कारण मन करता है कि यह काम छोड़ दें। मिट्टी की कीमत बढ़ गई है, रंग और सजावट की सामग्री भी महंगी हो गई है। कभी-कभी तो इतनी कमाई भी नहीं होती कि खर्च निकल सके।

फिर भी इन कुम्हारों की आस्था और कला के प्रति समर्पण अदम्य है। थकान और संघर्ष के बावजूद वे हर वर्ष नए जोश से मूर्तियाँ बनाते हैं ताकि दीपावली पर लोगों के घरों में खुशियाँ और समृद्धि का प्रतीक गणेश-लक्ष्मी विराजमान हो सकें। कुम्हारों की यह मेहनत न केवल पारंपरिक कला को जीवित रखती है, बल्कि बनारस की सांस्कृतिक पहचान का भी अभिन्न हिस्सा बनी हुई है। अब यह देखना होगा कि क्या सरकार और समाज मिलकर इन मिट्टी के कलाकारों की मेहनत का सही मूल्य दिलाने में सहयोग करते हैं या नहीं।।।

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