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चेतगंज की 140वीं ऐतिहासिक नक्कटैया आज, एयर शो की तर्ज पर दिखेगा आसमान में रोमांचक नजारा, 100 से अधिक लाग-विमान बनेंगे आकर्षण का केंद्

चीफ एडिटर : अमर नाथ साहू

वाराणसी। धर्म और संस्कृति की नगरी काशी में ऐतिहासिक परंपराओं का गौरव एक बार फिर देखने को मिलेगा। वाराणसी के चेतगंज में आयोजित होने वाला ऐतिहासिक नक्कटैया मेला आज 29 अक्टूबर 2026, करवा चौथ की रात भव्य अंदाज में सजने जा रहा है। अपनी गौरवशाली परंपरा के 140वें वर्ष में प्रवेश कर रही चेतगंज की नक्कटैया इस बार कई खास आकर्षणों के साथ लोगों का ध्यान खींचेगी।

मेले में 100 से अधिक

लाग-विमान आकर्षण का प्रमुख केंद्र बनेंगे। वहीं, एयर शो की तर्ज पर आसमान में रोमांचक नजारे दिखाने की तैयारी है। पारंपरिक धार्मिक-सांस्कृतिक आयोजन में आधुनिक अंदाज का यह अनूठा संगम दर्शकों के लिए खास अनुभव साबित हो सकता है। नक्कटैया देखने के लिए काशी सहित आसपास के क्षेत्रों से बड़ी संख्या में लोगों के पहुंचने की उम्मीद है।

धार्मिक परंपरा और आधुनिकता का अनूठा संगम

चेतगंज की नक्कटैया केवल एक मेला नहीं, बल्कि काशी की ऐतिहासिक सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है। वर्षों से चली आ रही इस परंपरा में धार्मिक प्रसंगों, आकर्षक झांकियों और विभिन्न लाग-विमानों के माध्यम से लोगों को भारतीय संस्कृति से जुड़ने का अवसर मिलता है। 140वें आयोजन को खास बनाने के लिए इस बार भी आकर्षक प्रस्तुतियों की तैयारी की गई है।
मोबाइल रेडिएशन के खतरों के प्रति भी किया जाएगा जागरूक
इस बार नक्कटैया मेले में मनोरंजन के साथ सामाजिक जागरूकता का संदेश भी दिया जाएगा। बच्चों और महिलाओं को मोबाइल फोन के अत्यधिक उपयोग से जुड़े संभावित खतरों तथा रेडियोफ्रीक्वेंसी रेडिएशन के बारे में जानकारी देने की पहल की जाएगी। इसके साथ ही मोबाइल के सुरक्षित और संतुलित इस्तेमाल के उपायों के प्रति लोगों को जागरूक करने पर जोर रहेगा।

काशी की विरासत को करीब से देखने का अवसर

करवा चौथ की रात आयोजित होने वाला यह ऐतिहासिक मेला काशी की सांस्कृतिक पहचान को एक बार फिर जीवंत करेगा। एक ओर पारंपरिक लाग-विमानों की भव्यता दिखाई देगी, तो दूसरी ओर आसमान में रोमांचक दृश्य आयोजन को विशेष बनाएंगे। धार्मिक आस्था, लोक परंपरा और सामाजिक जागरूकता का संदेश देने वाली चेतगंज की 140वीं नक्कटैया पर इस बार लोगों की निगाहें टिकी हैं।
चेतगंज की नक्कटैया एक बार फिर यह संदेश देने को तैयार है कि काशी की पहचान केवल उसके प्राचीन मंदिरों और गंगा घाटों तक सीमित नहीं, बल्कि यहां की जीवंत परंपराओं और सांस्कृतिक आयोजनों में भी बसती है।

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