चीफ एडिटर – अमर नाथ साहू
ब्यूरो – राकेश सदेजा

काशी के दशाश्वमेध घाट पर शरद पूर्णिमा की शाम शहीद जवानों की याद में आकाशदीप जगमगा उठे। गंगा किनारे बांस की टोकरियों में टिमटिमाते दीप चंद्रहार की तरह नजर आए। गंगोत्री सेवा समिति की ओर से आयोजित वार्षिक कार्यक्रम में पुलिस और पीएसी के 11 बलिदानी जवानों को श्रद्धांजलि दी गई। इस दौरान मां गंगा की धारा में 101 दीपों का दान किया गया।
कार्यक्रम में पीएसी के बैंड की धुनों के बीच शहीद जवानों को याद किया गया। विशिष्ट अतिथियों ने उनकी स्मृति में आकाशदीप प्रज्वलित किए। देश और समाज की सुरक्षा करते हुए अपने प्राण न्योछावर करने वाले जवानों के नामों का स्मरण कर उन्हें नमन किया गया।
इससे पहले पांच वैदिक आचार्यों ने मां गंगा का षोडशोपचार पूजन किया। गंगोत्री सेवा समिति के अध्यक्ष पं. किशोरी रमण दुबे ने बताया कि कार्तिक मास में पुलिस और पीएसी के बलिदानी जवानों की स्मृति में गंगा तट पर आकाशदीप जलाए जाते हैं। मान्यता है कि ये दीप दिवंगत आत्माओं के मार्ग को रोशन करते हैं। कार्तिक मास में दीपदान का विशेष महत्व है। आकाशदीप शहीदों के प्रति समाज की श्रद्धा और सम्मान का प्रतीक हैं।

बांस की पिटारी में दीप जलाने की परंपरा
काशी के घाटों पर कार्तिक मास में आकाशदीप जलाने की परंपरा सदियों से चली आ रही है। मान्यता के अनुसार, ये दीप दिवंगत आत्माओं के लिए प्रकाश का प्रतीक हैं। बलराम मिश्र ने बताया कि पौराणिक ग्रंथों में भी आकाशदीप की आध्यात्मिक महत्ता का उल्लेख मिलता है। आकाश को परमात्मा का प्रतीक माना गया है, जबकि बांस की पिटारी में लगी खपच्चियां जीवात्मा के अस्तित्व को दर्शाती हैं। पिटारी में जलता दीप आस्था और आध्यात्मिक विश्वास का संगम दिखाता है।

15 से 20 फीट ऊंचे बांस पर लगाए जाते हैं दीप
आकाशदीप लगाने की तैयारी भी खास होती है। इसके लिए 15 से 20 फीट लंबे बांस का इस्तेमाल किया जाता है। बांस के ऊपरी सिरे पर बांस से बनी विशेष टोकरी लगाई जाती है, जिसमें दीप रखा जाता है। रस्सी की मदद से टोकरी को ऊपर खींचा जाता है। इसके बाद हर शाम दीप जलाकर प्रार्थना की जाती है। कार्तिक मास में काशी के घाटों पर ऊंचाई पर टिमटिमाते ये दीप श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र बनते हैं।



