HomeUncategorizedनहीं रहे, कंस्ट्रक्शन किंग उमाशंकर सिंह : ऋचा वर्मा

नहीं रहे, कंस्ट्रक्शन किंग उमाशंकर सिंह : ऋचा वर्मा

ब्यूरो रिपोर्ट : ऋचा वर्मा

बलिया। उत्तर प्रदेश की राजनीति में अपनी अलग पहचान रखने वाले तथा बसपा के वरिष्ठ नेता एवं रसड़ा से लगातार तीन बार विधायक रहे उमाशंकर सिंह का कैंसर से लंबी लड़ाई के बाद निधन हो गया। उनके निधन से न केवल बलिया बल्कि पूरे प्रदेश के राजनीतिक एवं सामाजिक क्षेत्र में शोक की लहर है।

उमाशंकर सिंह को पूर्वांचल में “कंस्ट्रक्शन किंग” के नाम से भी जाना जाता था। निर्माण कार्यों और ठेकेदारी के क्षेत्र में उनकी मजबूत पकड़ को लेकर राजनीतिक गलियारों में अक्सर चर्चाएं होती थीं। समर्थकों का दावा था कि लोक निर्माण विभाग (PWD) सहित विभिन्न विभागों में उनकी विशेष प्रभावशाली पहचान थी।
राजनीतिक जीवन में कई ऐसे अवसर आए, जब विपक्षी विधायक होने के बावजूद उनकी प्रशासनिक और राजनीतिक पहुंच चर्चा का विषय बनी। स्थानीय स्तर पर यह भी चर्चा रही कि एक पुल के उद्घाटन को लेकर तत्कालीन परिवहन मंत्री दयाशंकर सिंह के साथ हुए विवाद के बाद उन्होंने अपने राजनीतिक प्रभाव का परिचय दिया। पूर्व में उनके प्रतिष्ठानों पर आयकर विभाग की कार्रवाई भी सुर्खियों में रही थी। उस समय उनके समर्थकों और राजनीतिक सहयोगियों ने कार्रवाई का विरोध किया था। उनके समधी एवं उत्तर प्रदेश सरकार के मंत्री दिनेश प्रताप सिंह ने भी सार्वजनिक रूप से अपना पक्ष रखा था।
बसपा प्रमुख मायावती के साथ उमाशंकर सिंह के करीबी संबंध भी अक्सर चर्चा में रहे। राजनीतिक मतभेदों के बावजूद पार्टी नेतृत्व ने उन पर विश्वास बनाए रखा। राजनीतिक जानकारों के अनुसार, राज्यसभा चुनाव में भाजपा के पक्ष में मतदान करने के बावजूद उन्हें पार्टी से बाहर नहीं किया गया। मायावती उन्हें अपना छोटा भाई मानती थीं और रक्षाबंधन के अवसर पर उन्हें राखी भी बांधती थीं।

राजनीति के साथ-साथ उमाशंकर सिंह अपनी समाजसेवा के लिए भी जाने जाते थे। समर्थकों के अनुसार, उन्होंने आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों की हजारों बेटियों के सामूहिक विवाह कराए तथा विवाह का संपूर्ण खर्च स्वयं वहन किया। जरूरतमंद लोगों की आर्थिक सहायता और जनसेवा के अनेक कार्यों के कारण क्षेत्र में उनकी विशेष लोकप्रियता थी।
उमाशंकर सिंह के निधन के साथ ही उत्तर प्रदेश विधानसभा में बहुजन समाज पार्टी का प्रतिनिधित्व समाप्त हो गया है। लंबे समय बाद ऐसा अवसर आया है जब विधानसभा में बसपा का कोई विधायक शेष नहीं है। उनके निधन को प्रदेश की राजनीति में एक महत्वपूर्ण क्षति के रूप में देखा जा रहा है।

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