चीफ एडिटर : अमर नाथ साहू
यूपी हेड : अजय लखमानी

वाराणसी। देवाधिदेव महादेव की नगरी काशी में बसंत पंचमी पर बाबा विश्वनाथ के तिलकोत्सव की तैयारियां शुरू हो गई हैं। सदियों पुरानी लोकपरंपरा के अनुसार हर वर्ष बसंत पंचमी पर टेढ़ीनीम स्थित काशी विश्वनाथ मंदिर के पूर्व महंत आवास पर बाबा विश्वनाथ की पंचबदन चल प्रतिमा का विधि-विधानपूर्वक तिलकोत्सव किया जाता है। यह तिलकोत्सव काशीवासियों की ओर से लोकाचार के रूप में संपन्न होता है, जिसमें सम्पूर्ण काशी बाबा के सगुन में सहभागी बनती है।
इस वर्ष बसंत पंचमी (शुक्रवार) को पहली बार दशाश्वमेध स्थित सिद्धपीठ बड़ी शीतला माता मंदिर के महंत परिवार की ओर से काशीपुराधीश्वर बाबा विश्वनाथ का तिलकोत्सव संपन्न कराया जाएगा। इसके साथ ही काशी की उन लोकपरंपराओं का शुभारंभ हो जाएगा, जो बाबा के विवाह उत्सव से जुड़ी मानी जाती हैं और जो रंगभरी एकादशी पर माता गौरा के गौना तक निरंतर चलती रहती हैं।
बड़ी शीतला माता मंदिर निभाएगा इस वर्ष तिलकोत्सव की जिम्मेदारी
सिद्धपीठ बड़ी शीतला माता मंदिर के उपमहंत अवशेष पाण्डेय (कल्लू महाराज) ने बताया कि काशी की लोकपरंपरा के अनुसार प्रत्येक वर्ष किसी न किसी काशीवासी परिवार द्वारा बाबा विश्वनाथ के तिलकोत्सव का दायित्व निभाया जाता है। इसी क्रम में इस वर्ष यह सौभाग्य बड़ी शीतला माता मंदिर के महंत परिवार को प्राप्त हुआ है।

उन्होंने बताया कि गुरुवार को तिलकोत्सव से संबंधित सभी बड़ी शीतला माता मंदिर से बांसफाटक स्थित धर्म निवास परिसर में अवस्थित श्रीयंत्र पीठम लाई जाएगी। यहीं से शुक्रवार को सायंकाल शुभ समय पर तिलकोत्सव का पारंपरिक आयोजन आरंभ होगा।
11 वैदिक ब्राह्मणों द्वारा होगा विशेष पूजन
महंत आवास पर होने वाले आयोजन से संबंधित शिवांजलि के संयोजक संजीव रत्न मिश्र ने बताया कि बसंत पंचमी के अवसर पर सायंकाल तिलकोत्सव से पूर्व टेढ़ीनीम स्थित महंत आवास पर विशेष धार्मिक अनुष्ठान संपन्न कराया जाएगा।

सप्तर्षि आरती से पूर्व होगा तिलकोत्सव
सायंकाल शुभ लग्न के अनुसार विश्वनाथ मंदिर में होने वाली सप्तर्षि आरती से पहले बाबा विश्वनाथ का तिलकोत्सव किया जाएगा। वैदिक विधि-विधान के साथ काशीवासी बाबा को तिलक अर्पित करेंगे और उनके विवाह से जुड़े सगुन की शुरुआत करेंगे। लोकमान्यता है कि बसंत पंचमी से लेकर रंगभरी एकादशी तक बाबा विश्वनाथ विवाहोत्सव के भाव में रहते हैं। रंगभरी एकादशी के दिन बाबा माता गौरा को गौना लेकर काशी विश्वनाथ मंदिर आते हैं, जिसके साथ यह परंपरा अपने चरम पर पहुंचती है।



